भगवद् गीता श्लोक

26.9.18

न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्‌ । कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥3.5॥   भावार्थ : निःसंदेह कोई भी मनुष्य किसी ...

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भगवद् गीता श्लोक

26.9.18

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः॥12.17॥   भावार्थ : जो न कभी हर्षित होता है, न ...

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7.9.18

यदि कोई आग, ऋण, या शत्रु अल्प मात्रा अथवा न्यूनतम सीमा तक भी अस्तित्व में बचा रहेगा तो बार बार बढ़ेगा ; अत: इन्हें थोड़ा सा भी बचा नही रह...

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7.9.18

तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥ 4॥ हे तात ! स्वर्ग और मोक्ष के सब सुखों को तराजू के एक पल...

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